
24 घंटे से अधिक उत्खनन जारी रहने की शिकायत, खनिज विभाग की चुप्पी पर सवाल; नाम नहीं लेंगे, लेकिन जनता सब जानती है!
तिल्दा-नेवरा। तिल्दा-नेवरा के ग्राम पंचायत बिलारी में कथित अवैध मुरूम उत्खनन का मामला लगातार सुर्खियों में है। धरती का सीना चीरकर मुरूम निकालने का सिलसिला आखिर कब थमेगा? इस गतिविधि के पीछे किसका हाथ है और जिम्मेदार विभाग कार्रवाई करने से क्यों पीछे हट रहा है? ये सवाल अब केवल प्रशासनिक व्यवस्था तक सीमित नहीं रह गए हैं, बल्कि क्षेत्र की राजनीतिक कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े कर रहे हैं।
बताया जा रहा है कि बिलारी में 24 घंटे से अधिक समय तक मुरूम उत्खनन जारी रहने की शिकायतें सामने आ रही हैं। यदि यह उत्खनन बिना वैध अनुमति या निर्धारित सीमा से बाहर किया जा रहा है, तो यह सीधे तौर पर नियमों के पालन और सरकारी राजस्व की सुरक्षा से जुड़ा मामला है। ऐसे में खनिज विभाग की जिम्मेदारी बनती है कि वह मौके पर पहुंचकर जांच करे और वास्तविक स्थिति जनता के सामने रखे।
नाम नहीं लेंगे, लेकिन सवालों से बचना आसान नहीं!
बिलारी में चल रहे कथित अवैध उत्खनन को लेकर क्षेत्र में राजनीतिक संरक्षण की चर्चाएं भी हो रही हैं। सवाल यह है कि आखिर वह कौन-सी ताकत है, जिसके रहते उत्खनन का यह सिलसिला रुकने का नाम नहीं ले रहा? क्या किसी प्रभावशाली नेता या मंत्री की राजनीतिक पहुंच के कारण कार्रवाई प्रभावित हो रही है? इन सवालों की निष्पक्ष जांच जरूरी है।
नाम हम नहीं लेते, लेकिन क्षेत्र की जनता के बीच कौन प्रभावशाली है और किसकी राजनीतिक पहुंच की चर्चा होती है, यह बात किसी से छिपी नहीं है। हालांकि, किसी नेता या मंत्री की संलिप्तता की पुष्टि जांच और ठोस साक्ष्यों के आधार पर ही हो सकती है। प्रशासन को भी इस मामले में चुप्पी साधने के बजाय तथ्यों के साथ जवाब देना चाहिए।
भाजपा सरकार में भ्रष्टाचार के आरोपों पर उठ रहे सवाल
प्रदेश में भाजपा की सरकार होने के बावजूद यदि स्थानीय स्तर पर अवैध उत्खनन की शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं, तो यह सरकार की निगरानी व्यवस्था और भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई के दावों पर सवाल खड़े करता है। आखिर सरकार की सख्ती का असर जमीन पर दिखाई क्यों नहीं दे रहा? यदि संबंधित विभागों को गतिविधि की जानकारी है, तो कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट क्यों नहीं की जा रही?
सरकार किसी भी दल की हो, लेकिन कानून का पालन सभी के लिए समान होना चाहिए। यदि किसी राजनीतिक प्रभाव या विभागीय लापरवाही के कारण नियमों का उल्लंघन हो रहा है, तो उसकी जांच होनी चाहिए। जनता को केवल आश्वासन नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई दिखाई देनी चाहिए।
खनिज विभाग की भूमिका भी जांच के दायरे में आए
स्थानीय स्तर पर खनिज विभाग की मिलीभगत की आशंका भी जताई जा रही है। हालांकि, इसकी पुष्टि अभी नहीं हुई है। ऐसे में विभाग के अधिकारियों को स्पष्ट करना चाहिए कि बिलारी में उत्खनन की अनुमति किसके नाम पर है, कितनी मात्रा में मुरूम निकालने की स्वीकृति दी गई है और मौके पर नियमों का पालन हो रहा है या नहीं।
यदि उत्खनन अवैध पाया जाता है, तो संबंधित लोगों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जाए। साथ ही, यह भी जांच हो कि लंबे समय तक गतिविधि जारी रहने के बावजूद निगरानी में चूक क्यों हुई।
जनता जानना चाहती है—कार्रवाई कब होगी?
बिलारी का मामला अब एक सीधा सवाल बनकर सामने खड़ा है—यदि सब कुछ नियमों के अनुसार है, तो जांच से परहेज क्यों? और यदि नियमों का उल्लंघन हो रहा है, तो कार्रवाई में देरी क्यों?
धरती किसी नेता, मंत्री या प्रभावशाली व्यक्ति की निजी संपत्ति नहीं है। प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा करना प्रशासन की जिम्मेदारी है। जनता को यह जानने का अधिकार है कि उत्खनन वैध है या अवैध, शासन को राजस्व मिल रहा है या नहीं और शिकायतों के बावजूद कार्रवाई क्यों नहीं हो रही।
अब देखना होगा कि खनिज विभाग और जिला प्रशासन बिलारी पहुंचकर निष्पक्ष जांच करते हैं या फिर धरती का सीना चीरने का यह कथित खेल यूं ही चलता रहेगा। जनता के सवालों का जवाब बयानबाजी से नहीं, बल्कि पारदर्शी जांच और ठोस कार्रवाई से मिलना चाहिए।
