
तिल्दा-नेवरा की राजनीति में “चम्मच” पर तंज, पांच साल बाद बदलती निष्ठाओं को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म
तिल्दा-नेवरा। राजनीति में पांच साल का सफर भी कम दिलचस्प नहीं होता। पूरे कार्यकाल में किसी की प्लेट भरी रहे तो चम्मच की चमक भी बरकरार रहती है। लेकिन सवाल तब खड़ा होता है, जब पांच साल पूरे हों और प्लेट बदलने का वक्त आए।
जब तक प्लेट में खाना रहेगा,
चम्मच भी साथ निभाता रहेगा।
पांच साल तक निवाला मिलता रहेगा,
चम्मच भी बड़े प्यार से खिलाता रहेगा।
लेकिन जब प्लेट खाली हो जाएगी,
चम्मच की असली कहानी सामने आएगी।
फिर सवाल यही उठेगा—
“अब चम्मच किस थाली में जाएगा?”
तिल्दा-नेवरा की राजनीतिक चर्चाओं में इन दिनों इसी अंदाज में एक “चम्मच” पर व्यंग्य किया जा रहा है। पांच साल तक एक प्लेट के आसपास रहने वाले इस चम्मच की अगली मंजिल क्या होगी, यह सवाल राजनीतिक गलियारों में मजाकिया अंदाज में पूछा जा रहा है।
क्या चम्मच फिर कांग्रेस की प्लेट में आएगा,
या भाजपा की थाली में अपना ठिकाना बनाएगा?
जिस प्लेट में मिलेगा निवाला,
चम्मच उसी का गाएगा तराना?
राजनीति में दल बदलना कोई नई बात नहीं है, लेकिन जनता की नजर में सवाल हमेशा निष्ठा का रहता है। विचारधारा के साथ खड़ा होना अलग बात है और सत्ता-सुविधा के साथ खड़ा होना अलग।
प्लेट बदलेगी तो चम्मच भी बदलेगा क्या,
सियासी मौसम के साथ रंग भी बदलेगा क्या?
पांच साल की कहानी अब खत्म होने को है,
देखना है चम्मच किस थाली में जमने को है।
फिलहाल तिल्दा-नेवरा की राजनीतिक चर्चाओं में सबसे मजेदार सवाल यही है—पांच साल बाद प्लेट बदलेगी तो चम्मच कहां जाएगा? कांग्रेस की प्लेट में, भाजपा की प्लेट में या फिर कोई तीसरी थाली तलाशेगा?
राजनीति की थाली बड़ी निराली है,
कभी खाली, कभी पूरी प्याली है।
चम्मच की बस एक ही पहचान,
“जिस थाली में दिखे निवाला, उसी तरफ झुक जाए उसकी कमान!”
